
Advertise on podcast: Voice Of Sanket
This podcast has
26 episodes
Language
HindiPublisher
Sanket PandeyExplicit
No
Date created
2020/04/06
Latest episode
2026/01/30
Average duration
14 min.
Release period
37 days
Description
यहाँ थोक भाव मे टूटे दिलों का हाल बयाँ होता है, और उसकी मरहमपट्टी की जाती है!
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Podcast episodes
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साँप और नेवला - सभ्यताओं का युद्ध (From archives)
2026/01/30
Two nation theory in parallel universe!
सूरज का चालीसवां फेरा
2026/01/28
समय अच्छा, बुरा, धीमा, तेज़, लम्बा छोटा सब होता है। समय जितने रूप धर सकता है कोई और धर सकता है क्या?
ग्रीटिंग कार्ड और सच्ची का नया साल
2026/01/13
जब पेन की स्याही और ग्रीटिंग कार्ड के सख़्त कागज़ मिलकर नया साल मुबारक कर देते थे।
इश्क़ का साढ़े सातवां मक़ाम
2025/12/04
इश्क़ का साढ़े सातवां मक़ाम - जी भर कर जी हुई ज़िंदगी
उत्तर प्रदेश - अधोपतन से उर्ध्वगमन तक
2025/09/25
उत्तर प्रदेश - दुनिया को प्रतिभा का कच्चा माल देकर खुद अपने हँसते खेलते आँगन को कंगाल कर दे रहा था। उसी पर एक टिप्पणी।
ज़ेहरा और मानव - टीस का पूर्णविराम
2025/06/19
पूर्ण विराम और हज़ारों खाली पन्ने
ज़ेहरा और मानव - महकी मुलाकातें
2025/05/15
बात या साथ, दोनों में क्या खास जब ये समझ आना बंद हो जाए तो आप की मुलाकातें महक उठती हैं।
ज़ेहरा और मानव - सिलसिला
2025/04/26
बातें बेल की तरह हैं, जहां सहारा मिला वहीं बढ़ जाती हैं, और फैलने लगती हैं छाने लगती हैं।
और अगर बातों में दम हो तो बातों से उपजी यादें एक दिन बरगद बन जाती हैं, जितनी पुरानी उतनी ही शाखाएँ और उनसे लटकती उतनी ही जड़ें।
ज़ेहरा और मानव - रात के दो-ढाई बजे
2025/04/12
बातें ही बात बढ़ाती हैं, बशर्ते लोग बातें कर रहे हों, बस बोल न रहे हों।
ज़ेहरा और मानव - गुंडे और गाने
2025/04/05
नायक गुंडों की पिटाई भी कर सकता है और गाने भी गा सकता। हिंदी सनीमी ने तो यही दिखाया है खैर!
ज़ेहरा और मानव - ५ बनाम ३६५
2025/03/02
तुम्हारे साथ बिताया समय ही मेरी दौलत है, उसे दिमाग़ में घुमा लेता हूं तो जो ROI मिलता है, वो कोई multibagger नहीं दे पाएगा।
ज़ेहरा और मानव - Love in the air
2025/01/09
जब हम किसी के बगल होने भर से खिल जाएं, तो समझिए कि आप दोनों बीच के अनूठा अनुनाद है।
ज़ेहरा और मानव - उन्नीस से उन्यासी तक
2024/12/15
जो हवा में है, वो हमेशा मामूली नहीं होता और जो ठोस है वो हमेशा खास नहीं होता।
ज़ेहरा और मानव - सांसे, बातें और पहाड़
2024/09/16
आज बिना कुछ चाहे वो ज़ेहरा को अपनी आँखों मे देखने दे रहा था, इस उम्मीद में कि ज़ेहरा उसके मन के उस कोने में उतर जाए जहाँ कभी कोई नहीं गया, किसी ने वो जगह बुहार के वहाँ थोड़ा पानी छिड़क कर दीपक नहीं जलाया
ज़ेहरा और मानव - भँवरे की गुनगुन
2024/09/11
उस पहाड़ पर जाकर हम लौट तो आए , और जितना खुद को लेकर गए थे उससे कहीं ज्यादा ही होकर आए, फिर लगता है वहां बहुत कुछ छोड़ आए!
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