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Aah se Upja Gaan

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This podcast has
17 episodes
Language
Hindi
Publisher
Mohit Mishra
Explicit
No
Date created
2021/09/12
Latest episode
2023/07/18
Average duration
26 min.
Release period
61 days

Description

Your weekly dose of Hindi-Hindwi poetry... The goal is to read a poem the way poem should be read. :)

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परशुराम की प्रतीक्षा खण्ड 1,2,3 Parshuram ki Pratiksha Khand 1,2,3
2023/07/18
गरदन पर किसका पाप वीर ! ढोते हो ? शोणित से तुम किसका कलंक धोते हो ? उनका, जिनमें कारुण्य असीम तरल था, तारुण्य-ताप था नहीं, न रंच गरल था; सस्ती सुकीर्ति पा कर जो फूल गये थे, निर्वीर्य कल्पनाओं में भूल गये थे; गीता में जो त्रिपिटक-निकाय पढ़ते हैं, तलवार गला कर जो तकली गढ़ते हैं; शीतल करते हैं अनल प्रबुद्ध प्रजा का, शेरों को सिखलाते हैं धर्म अजा का; सारी वसुन्धरा में गुरु-पद पाने को, प्यासी धरती के लिए अमृत लाने को जो सन्त लोग सीधे पाताल चले थे, (अच्छे हैं अबः; पहले भी बहुत भले थे।) हम उसी धर्म की लाश यहाँ ढोते हैं, शोणित से सन्तों का कलंक धोते हैं। खण्ड-2हे वीर बन्धु ! दायी है कौन विपद का ? हम दोषी किसको कहें तुम्हारे वध का ? यह गहन प्रश्न; कैसे रहस्य समझायें ? दस-बीस अधिक हों तो हम नाम गिनायें। पर, कदम-कदम पर यहाँ खड़ा पातक है, हर तरफ लगाये घात खड़ा घातक है। घातक है, जो देवता-सदृश दिखता है, लेकिन, कमरे में गलत हुक्म लिखता है, जिस पापी को गुण नहीं; गोत्र प्यारा है, समझो, उसने ही हमें यहाँ मारा है। जो सत्य जान कर भी न सत्य कहता है, या किसी लोभ के विवश मूक रहता है, उस कुटिल राजतन्त्री कदर्य को धिक् है, यह मूक सत्यहन्ता कम नहीं वधिक है। चोरों के हैं जो हितू, ठगों के बल हैं, जिनके प्रताप से पलते पाप सकल हैं, जो छल-प्रपंच, सब को प्रश्रय देते हैं, या चाटुकार जन से सेवा लेते हैं; यह पाप उन्हीं का हमको मार गया है, भारत अपने घर में ही हार गया है। है कौन यहाँ, कारण जो नहीं विपद् का ? किस पर जिम्मा है नहीं हमारे वध का ? जो चरम पाप है, हमें उसी की लत है, दैहिक बल को कहता यह देश गलत है। नेता निमग्न दिन-रात शान्ति-चिन्तन में, कवि-कलाकार ऊपर उड़ रहे गगन में। यज्ञाग्नि हिन्द में समिध नहीं पाती है, पौरुष की ज्वाला रोज बुझी जाती है। ओ बदनसीब अन्धो ! कमजोर अभागो ? अब भी तो खोलो नयन, नींद से
प्रणति राम धारी सिंह दिनकर pranati by Ramdhari Sinh Dinkar
2023/01/15
प्रणति-1कलम, आज उनकी जय बोल जला अस्थियाँ बारी-बारी छिटकाई जिनने चिंगारी, जो चढ़ गये पुण्यवेदी पर लिए बिना गर्दन का मोल । कलम, आज उनकी जय बोल । जो अगणित लघु दीप हमारे तूफानों में एक किनारे, जल-जलाकर बुझ गए, किसी दिन माँगा नहीं स्नेह मुँह खोल । कलम, आज उनकी जय बोल । पीकर जिनकी लाल शिखाएँ उगल रहीं लू लपट दिशाएं, जिनके सिंहनाद से सहमी धरती रही अभी तक डोल । कलम, आज उनकी जय बोल । अंधा चकाचौंध का मारा क्या जाने इतिहास बेचारा ? साखी हैं उनकी महिमा के सूर्य, चन्द्र, भूगोल, खगोल । कलम, आज उनकी जय बोल । प्रणति-2नमन उन्हें मेरा शत बार । सूख रही है बोटी-बोटी, मिलती नहीं घास की रोटी, गढ़ते हैं इतिहास देश का सह कर कठिन क्षुधा की मार । नमन उन्हें मेरा शत बार । अर्ध-नग्न जिन की प्रिय माया, शिशु-विषण मुख, जर्जर काया, रण की ओर चरण दृढ जिनके मन के पीछे करुण पुकार । नमन उन्हें मेरा शत बार । जिनकी चढ़ती हुई जवानी खोज रही अपनी क़ुर्बानी जलन एक जिनकी अभिलाषा, मरण एक जिनका त्योहार । नमन उन्हें मेरा शत बार । दुखी स्वयं जग का दुःख लेकर, स्वयं रिक्त सब को सुख देकर, जिनका दिया अमृत जग पीता, कालकूट उनका आहार । नमन उन्हें मेरा शत बार । वीर, तुम्हारा लिए सहारा टिका हुआ है भूतल सारा, होते तुम न कहीं तो कब को उलट गया होता संसार । नमन तुम्हें मेरा शत बार । चरण-धूलि दो, शीश लगा लूँ, जीवन का बल-तेज जगा लूँ, मैं निवास जिस मूक-स्वप्न का तुम उस के सक्रिय अवतार । नमन तुम्हें मेरा शत बार । प्रणति-3आनेवालो ! तुम्हें प्रणाम । 'जय हो', नव होतागण ! आओ, संग नई आहुतियाँ लाओ, जो कुछ बने फेंकते जाओ, यज्ञ जानता नहीं विराम । आनेवालो ! तुम्हें प्रणाम । टूटी नहीं शिला की कारा, लौट गयी टकरा कर धारा, सौ धिक्कार तुम्हें यौवन के वेगवंत निर्झर उद्दाम । आनेवालो ! तुम्हें प्रणाम । फिर डंके पर चोट पड़ी है, मौत चुनौती
Some Couplets of Munnavvar Rana. मुन्नव्वर राना की चुनिंदा शायरियाँ
2022/06/07
Enjoy
गीत कैसे लिखें? How to write songs in HINDI / URDU/ HINDWI ?
2021/11/22
Dr. Jyotsana Sharma is an avid scholar and a well published poet. She had agreed to tell us fundamentals of Geet writing and this is the audio of the same video recording.
Kavya-Goshthi, Participants Mohit, Manish, Nilesh, Sumit on 17-10-21
2021/10/17
Original Poems, Ghazals by four poetry lovers. We sat and got it recorded.
Rashmirathi Saptam Sarg part -2 रश्मीरथी सप्तम सर्ग-भाग २ by Pandit Shri Ramdhari Singh Dinkar Voice Mohit Mishra Karn ka Mahaprayan
2021/10/08
रथ सजा, भेरियां घमक उठीं, गहगहा उठा अम्बर विशाल, कूदा स्यन्दन पर गरज कर्ण ज्यों उठे गरज क्रोधान्ध काल । बज उठे रोर कर पटह-कम्बु, उल्लसित वीर कर उठे हूह, उच्छल सागर-सा चला कर्ण को लिये क्षुब्ध सैनिक-समूह । हेषा रथाश्व की, चक्र-रोर, दन्तावल का वृहित अपार, टंकार धुनुर्गुण की भीम, दुर्मद रणशूरों की पुकार । खलमला उठा ऊपर खगोल, कलमला उठा पृथ्वी का तन, सन-सन कर उड़ने लगे विशिख, झनझना उठी असियाँ झनझन । तालोच्च-तरंगावृत बुभुक्षु-सा लहर उठा संगर-समुद्र, या पहन ध्वंस की लपट लगा नाचने समर में स्वयं रुद्र । हैं कहाँ इन्द्र ? देखें, कितना प्रज्वलित मर्त्य जन होता है ? सुरपति से छले हुए नर का कैसा प्रचण्ड रण होता है ? अङगार-वृष्टि पा धधक उठ जिस तरह शुष्क कानन का तृण, सकता न रोक शस्त्री की गति पुञ्जित जैसे नवनीत मसृण । यम के समक्ष जिस तरह नहीं चल पाता बध्द मनुज का वश, हो गयी पाण्डवों की सेना त्योंही बाणों से विध्द, विवश । भागने लगे नरवीर छोड वह दिशा जिधर भी झुका कर्ण, भागे जिस तरह लवा का दल सामने देख रोषण सुपर्ण ! 'रण में क्यों आये आज ?' लोग मन-ही-मन में पछताते थे, दूर से देखकर भी उसको, भय से सहमे सब जाते थे । काटता हुआ रण-विपिन क्षुब्ध, राधेय गरजता था क्षण-क्षण । सुन-सुन निनाद की धमक शत्रु का, व्यूह लरजता था क्षण-क्षण । अरि की सेना को विकल देख, बढ चला और कुछ समुत्साह; कुछ और समुद्वेलित होकर, उमडा भुज का सागर अथाह । गरजा अशङक हो कर्ण, 'शल्य ! देखो कि आज क्या करता हूं, कौन्तेय-कृष्ण, दोनों को ही, जीवित किस तरह पकडता हूं । बस, आज शाम तक यहीं सुयोधन का जय-तिलक सजा करके, लौटेंगे हम, दुन्दुभि अवश्य जय की, रण-बीच बजा करके । इतने में कुटिल नियति-प्रेरित पड ग़ये सामने धर्मराज, टूटा कृतान्त-सा कर्ण, कोक पर पडे टूट जिस तरह बाज । लेकिन, दोनों का विषम युध्द, क्षण भर भी नहीं ठहर पाया, सह
Rashmirathi Saptam Sarg part -1 रश्मीरथी सप्तम सर्ग-भाग १ कर्ण की हुंकार Karna Ki Hunkar by Pandit Shri Ramdhari Singh Dinkar Voice Mohit Mishra
2021/10/06
1 निशा बीती, गगन का रूप दमका, किनारे पर किसी का चीर चमका। क्षितिज के पास लाली छा रही है, अतल से कौन ऊपर आ रही है ? संभाले शीश पर आलोक-मंडल दिशाओं में उड़ाती ज्योतिरंचल, किरण में स्निग्ध आतप फेंकती-सी, शिशिर कम्पित द्रुमों को सेंकती-सी, खगों का स्पर्श से कर पंख-मोचन कुसुम के पोंछती हिम-सिक्त लोचन, दिवस की स्वामिनी आई गगन में, उडा कुंकुम, जगा जीवन भुवन में । मगर, नर बुद्धि-मद से चूर होकर, अलग बैठा हुआ है दूर होकर, उषा पोंछे भला फिर आँख कैसे ? करे उन्मुक्त मन की पाँख कैसे ? मनुज विभ्राट् ज्ञानी हो चुका है, कुतुक का उत्स पानी हो चुका है, प्रकृति में कौन वह उत्साह खोजे ? सितारों के हृदय में राह खोजे ? विभा नर को नहीं भरमायगी यह है ? मनस्वी को कहाँ ले जायगी यह ? कभी मिलता नहीं आराम इसको, न छेड़ो, है अनेकों काम इसको । महाभारत मही पर चल रहा है, भुवन का भाग्य रण में जल रहा है। मनुज ललकारता फिरता मनुज को, मनुज ही मारता फिरता मनुज को । पुरुष की बुद्धि गौरव खो चुकी है, सहेली सर्पिणी की हो चुकी है, न छोड़ेगी किसी अपकर्म को वह, निगल ही जायगी सद्धर्म को वह । मरे अभिमन्यु अथवा भीष्म टूटें, पिता के प्राण सुत के साथ छूटें, मचे घनघोर हाहाकार जग में, भरे वैधव्य की चीत्कार जग में, मगर, पत्थर हुआ मानव- हृदय है, फकत, वह खोजता अपनी विजय है, नहीं ऊपर उसे यदि पायगा वह, पतन के गर्त में भी जायगा वह । पड़े सबको लिये पाण्डव पतन में, गिरे जिस रोज होणाचार्य रण में, बड़े धर्मिंष्ठ, भावुक और भोले, युधिष्ठिर जीत के हित झूठ बोले । नहीं थोड़े बहुत का मेद मानो, बुरे साधन हुए तो सत्य जानो, गलेंगे बर्फ में मन भी, नयन भी, अँगूठा ही नहीं, संपूर्ण तन भी । नमन उनको, गये जो स्वर्ग मर कर, कलंकित शत्रु को, निज को अमर कर, नहीं अवसर अधिक दुख-दैन्य का है, हुआ राधेय नायक सैन्य का है । जगा लो वह निराशा छोड़ करके, द्
Rashmirathi Shast Sarg part -2 रश्मीरथी षष्ठ सर्ग-भाग २ By Pandit Ramdhari Singh Dinkar Mohit Mishra
2021/10/03
Karn finally gets to show his mettle in the Great War. To force him to use his divine weapon so that it may not be used against Arjun, Shri Krishna Summons Ghatotkacha
Rashmirathi Shasht Sarg part -1 रश्मीरथी षष्ठ सर्ग-भाग १ by Pandit Shri Ramdhari Singh Dinkar Voice Mohit Mishra
2021/09/30
नरता कहते हैं जिसे, सत्तव क्या वह केवल लड़ने में है ? पौरूष क्या केवल उठा खड्ग मारने और मरने में है ? तब उस गुण को क्या कहें मनुज जिससे न मृत्यु से डरता है ? लेकिन, तक भी मारता नहीं, वह स्वंय विश्व-हित मरता है। है वन्दनीय नर कौन ? विजय-हित जो करता है प्राण हरण ? या सबकी जान बचाने को देता है जो अपना जीवन ? चुनता आया जय-कमल आज तक विजयी सदा कृपाणों से, पर, आह निकलती ही आयी हर बार मनुज के प्राणों से। आकुल अन्तर की आह मनुज की इस चिन्ता से भरी हुई, इस तरह रहेगी मानवता कब तक मनुष्य से डरी हुई ? पाशविक वेग की लहर लहू में कब तक धूम मचायेगी ? कब तक मनुष्यता पशुता के आगे यों झुकती जायेगी ? यह ज़हर ने छोड़ेगा उभार ? अंगार न क्या बूझ पायेंगे ? हम इसी तरह क्या हाय, सदा पशु के पशु ही रह जायेंगे ? किसका सिंगार ? किसकी सेवा ? नर का ही जब कल्याण नहीं ? किसके विकास की कथा ? जनों के ही रक्षित जब प्राण नहीं ? इस विस्मय का क्या समाधान ? रह-रह कर यह क्या होता है ? जो है अग्रणी वही सबसे आगे बढ़ धीरज खोता है। फिर उसकी क्रोधाकुल पुकार सबको बेचैन बनाती है, नीचे कर क्षीण मनुजता को ऊपर पशुत्व को लाती है। हाँ, नर के मन का सुधाकुण्ड लघु है, अब भी कुछ रीता है, वय अधिक आज तक व्यालों के पालन-पोषण में बीता है। ये व्याल नहीं चाहते, मनुज भीतर का सुधाकुण्ड खोले, जब ज़हर सभी के मुख में हो तब वह मीठी बोली बोले।  थोड़ी-सी भी यह सुधा मनुज का मन शीतल कर सकती है, बाहर की अगर नहीं, पीड़ा भीतर की तो हर सकती है। लेकिन धीरता किसे ? अपने सच्चे स्वरूप का ध्यान करे, जब ज़हर वायु में उड़ता हो पीयूष-विन्दू का पान करे। पाण्डव यदि पाँच ग्राम लेकर सुख से रह सकते थे, तो विश्व-शान्ति के लिए दुःख कुछ और न क्या कह सकते थे ? सुन कुटिल वचन दुर्योधन का केशव न क्यों यह का नहीं- "हम तो आये थे शान्ति हेतु, पर, तुम चाहो जो, वही सही। "तुम भड़क
Rashmirathi Pancham Sarg part -2 रश्मीरथी पंचम सर्ग-भाग २ Voice Mohit Mishra
2021/09/28
you can also find me on my youtube channel https://www.youtube.com/channel/UCOmnt0xo6H3nt3ZXOloTCPQ पहली वर्षा में मही भींगती जैसे, भींगता रहा कुछ काल कर्ण भी वैसे। फिर कण्ठ छोड़ बोला चरणों पर आकर, "मैं धन्य हुआ बिछुड़ी गोदी को पाकर। पर, हाय, स्वत्व मेरा न समय पर लायीं, माता, सचमुच, तुम बड़ी देर कर आयीं। अतएव, न्यास अंचल का ले ने सकूँगा, पर, तुम्हें रिक्त जाने भी दे न सकूँगा। "की पूर्ण सभी की, सभी तरह अभिलाषा, जाने दूँ कैसे लेकर तुम्हें निराशा ? लेकिन, पड़ता हूँ पाँव, जननि! हठ त्यागो, बन कर कठोर मुझसे मुझको मत माँगो। ‘केवल निमित्त संगर का दुर्योधन है, सच पूछो तो यह कर्ण-पार्थ का रण है। छीनो सुयोग मत, मुझे अंक में लेकर, यश, मुकुट, मान, कुल, जाति, प्रतिष्ठा देकर। "विष तरह-तरह का हँसकर पीता आया, बस, एक ध्येय के हित मैं जीता आया। कर विजित पार्थ को कभी कीर्ति पाऊँगा, अप्रतिम वीर वसुधा पर कहलाऊँगा। "आ गयी घड़ी वह प्रण पूरा करने की, रण में खुलकर मारने और मरने की। इस समय नहीं मुझमें शैथिल्य भरो तुम, जीवन-व्रत से मत मुझको विमुख करो तुम। "अर्जुन से लड़ना छोड़ कीर्ति क्या लूँगा ? क्या स्वयं आप अपने को उत्तर दूँगा ? मेरा चरित्र फिर कौन समझ पायेगा ? सारा जीवन ही उलट-पलट जायेगा। "तुम दान-दान रट रहीं, किन्तु, क्यों माता,  पुत्र ही रहेगा सदा जगत् में दाता ? दुनिया तो उससे सदा सभी कुछ लेगी, पर, क्या माता भी उसे नहीं कुछ देगी ? "मैं एक कर्ण अतएव, माँग लेता हूँ, बदले में तुमको चार कर्ण देता हूँ। छोडूँगा मैं तो कभी नहीं अर्जुन को, तोड़ूँगा कैसे स्वयं पुरातन प्रण को ? "पर, अन्य पाण्डवों पर मैं कृपा करूँगा, पाकर भी उनका जीवन नहीं हरूँगा। अब जाओ हर्षित-हृदय सोच यह मन में, पालूँगा जो कुछ कहा, उसे मैं रण में।" कुन्ती बोली, "रे हठी, दिया क्या तू ने ? निज को लेकर ले नहीं किया तू ने ? बनने आयी थी छह पुत्रों की माता, रह गया वाम का, पर, वाम ही विधाता। "पाक
Rashmirathi Pancham Sarg part -1 रश्मीरथी पंचम सर्ग-भाग १ Voice Mohit Mishra
2021/09/24
Kunti Meets Karna आ गया काल विकराल शान्ति के क्षय का, निर्दिष्ट लग्न धरती पर खंड-प्रलय का । हो चुकी पूर्ण योजना नियती की सारी, कल ही होगा आरम्भ समर अति भारी । कल जैसे ही पहली मरीचि फूटेगी, रण में शर पर चढ़ महामृत्यु छूटेगी । संहार मचेगा, तिमिर घोर छायेगा, सारा समाज दृगवंचित हो जायेगा । जन-जन स्वजनों के लिए कुटिल यम होगा, परिजन, परिजन के हित कृतान्त-सम होगा । कल से भाई, भाई के प्राण हरेंगे, नर ही नर के शोणित में स्नान करेंगे । सुध-बुध खो, बैठी हुई समर-चिंतन में, कुंती व्याकुल हो उठी सोच कुछ मन में । 'हे राम! नहीं क्या यह संयोग हटेगा? सचमुच ही क्या कुंती का हृदय फटेगा? 'एक ही गोद के लाल, कोख के भाई, सत्य ही, लड़ेंगे हो, दो ओर लड़ाई? सत्य ही, कर्ण अनुजों के प्राण हरेगा, अथवा, अर्जुन के हाथों स्वयं मरेगा? दो में जिसका उर फटे, फटूँगी मैं ही, जिसकी भी गर्दन कटे, कटूँगी मैं ही, पार्थ को कर्ण, या पार्थ कर्ण को मारे, बरसेंगें किस पर मुझे छोड़ अंगारे? 'भगवान! सुनेगा कथा कौन यह मेरी? समझेगा जग में व्यथा कौन यह मेरी? हे राम! निरावृत किये बिना व्रीडा को, है कौन, हरेगा जो मेरी पीड़ा को? गांधारी महिमामयी, भीष्म गुरुजन हैं, धृतराष्ट्र खिन्न, जग से हो रहे विमन हैं । तब भी उनसे कहूँ, करेंगे क्या वे? मेरी मणि मेरे हाथ धरेंगे क्या वे? यदि कहूँ युधिष्ठिर से यह मलिन कहानी, गल कर रह जाएगा वह भावुक ज्ञानी । तो चलूँ कर्ण से हीं मिलकर बात करूँ मैं  सामने उसी के अंतर खोल धरून मैं । लेकिन कैसे उसके सम्मुख जाऊँगी? किस तरह उसे अपना मुख दिखलाउंगी? माँगता विकल हो वस्तु आज जो मन है  बीता विरुद्ध उसके समग्र जीवन है । क्या समाधान होगा दुष्कृति के कर्म का? उत्तर दूंगी क्या, निज आचरण विषम का? किस तरह कहूँगी-पुत्र! गोद में आ तू,  इस जननी पाषाणी का ह्रदय जुड़ा तू?' चिंताकुल उलझी हुई व्यथा में, मन से, बाहर आई क
Rashmirathi Chaturtha Sarg Full रश्मीरथी चतुर्थ सर्ग सम्पूर्ण Ram Dhari Singh 'Dinkar' रामधारी सिंह 'दिनकर'
2021/09/21
Karna pays a heavy price for being true to his principles... 4. चतुर्थ सर्ग प्रेमयज्ञ अति कठिन कुण्ड में कौन वीर बलि देगा ? तन, मन, धन, सर्वस्व होम कर अतुलनीय यश लेगा ? हरि के सन्मुख भी न हार जिसकी निष्ठा ने मानी, धन्य-धन्य राधेय ! बन्धुता के अद्भुत अभिमानी । पर जाने क्यों नियम एक अद्भुत जग में चलता है, भोगी सुख भोगता, तपस्वी और अधिक जलता है । हरिआली है जहाँ, जलद भी उसी खण्ड के वासी, मरु की भूमि मगर। रह जाती है प्यासी की प्यासी । और, वीर जो किसी प्रतिज्ञा पर आकर अड़ता है, सचमुच, उसके लिए उसे सब-कुछ देना पड़ता है | नहीं सदा भीषिका दौड़ती द्वार पाप का पाकर, दु:ख भोगता कभी पुण्य को भी मनुष्य अपनाकर । पर, तब भी रेखा प्रकाश की जहाँ कहीं हँसती है, वहाँ किसी प्रज्वलित वीर नर की आभा बसती है; जिसने छोड़ी नहीं लीक विपदाओं से घबराकर । दो जग को रोशनी टेक पर अपनी जान गँवाकर । नरता का आदर्श तपस्या के भीतर पलता है, देता वही प्रकाश, आग में जो अभीत जलता है । आजीवन झेलते दाह का दंश वीर व्रतधारी, हो पाते तब कहीं अमरता के पद के अधिकारी । 'प्रण करना है सहज, कठिन है लेकिन, उसे निभाना, सबसे बडी जांचच है व्रत का अन्तिम मोल चुकाना । अन्तिम मूल्य न दिया अगर, तो और मूल्य देना क्या ? करने लगे मोह प्राणों का तो फिर प्रण लेना क्या ? सस्ती कीमत पर बिकती रहती जबतक कुर्बानी, तबतक सभी बने रह सकते हैं त्यागी, बलिदानी । पर, महँगी में मोल तपस्या का देना दुष्कर है, हँस कर दे यह मूल्य, न मिलता वह मनुष्य घर-घर है । जीवन का अभियान दान-बल से अजस्त्र चलता है,  उतनी बढ़ती ज्योति, स्नेह जितना अनल्प जलता है,  और दान मे रोकर या हसकर हम जो देते हैं,  अहंकार-वश उसे स्वत्व का त्याग मान लेते हैं।  यह न स्वत्व का त्याग, दान तो जीवन का झरना है,  रखना उसको रोक, मृत्यु के पहले ही मरना है।  किस पर करते कृपा वृक्ष यदि अपना फल देते हैं,  गिरने से उसको सँभाल

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