
Advertise on podcast: Shiv Puran Katha in Hindi
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60 episodes
Language
HindiPublisher
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No
Date created
2025/01/14
Latest episode
2026/02/02
Average duration
6 min.
Release period
8 days
Description
शिव पुराण सभी पुराणों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुराणों में से एक है। भगवान शिव के विविध रूपों, अवतारों, ज्योतिर्लिंगों, भक्तों और भक्ति का विशद् वर्णन किया गया है।इसमें शिव के कल्याणकारी स्वरूप का तात्त्विक विवेचन, रहस्य, महिमा और उपासना का विस्तृत वर्णन है। शिव पुराण में शिव को पंचदेवों में प्रधान अनादि सिद्ध परमेश्वर के रूप में स्वीकार किया गया है। शिव-महिमा, लीला-कथाओं के अतिरिक्त इसमें पूजा-पद्धति, अनेक ज्ञानप्रद आख्यान और शिक्षाप्रद कथाओं का सुन्दर संयोजन है। इसमें भगवान शिव के भव्यतम व्यक्तित्व का गुणगान किया गया है। शिव- जो स्वयंभू हैं, शाश्वत हैं,
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कामदेव का शिव को मोहित करने के लिए प्रयाण | शिव पुराण | श्रीरुद्र संहिता - अध्याय 17
2026/02/02
शिव पुराण का सत्रहवाँ अध्याय कामदेव के उस महत्वपूर्ण प्रयाण का वर्णन करता है, जिसमें देवताओं के कष्ट निवारण हेतु वे भगवान शिव को मोहित करने का प्रयास करते हैं। इस अध्याय में तारकासुर के अत्याचार, देवी पार्वती की तपस्या, इंद्रदेव की चिंता तथा शिव-पार्वती विवाह की पृष्ठभूमि का गूढ़ आध्यात्मिक विवरण मिलता है।
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Shiv Puran Adhyay 17 में कामदेव को देवताओं द्वारा शिव को मोहित करने का कार्य सौंपा जाता है, ताकि तारकासुर का वध संभव हो सके। यह अध्याय भक्ति, तपस्या, योग, वैराग्य और शिव-पार्वती के दिव्य मिलन की भूमिका को गहराई से प्रस्तुत करता है।
तारक का स्वर्ग त्याग शिव पुराण - श्रीरुद्र संहिता - अध्याय 16
2026/01/25
शिव पुराण का षोडशवाँ अध्याय तारकासुर के पतन की दिशा में एक निर्णायक मोड़ प्रस्तुत करता है। भगवान शिव के आदेश से तारकासुर स्वर्ग का त्याग करता है और पृथ्वी पर शोनित नगर में शासन प्रारंभ करता है। देवता पुनः स्वर्गलोक लौटते हैं और इंद्र के नेतृत्व में स्वर्ग का संतुलन स्थापित होता है।
यह अध्याय अहंकार, वरदान के दुरुपयोग और धर्म के मार्ग से विचलन के परिणामों को स्पष्ट करता है। शिव पुराण की यह कथा दर्शाती है कि जब अधर्म बढ़ता है, तब स्वयं महादेव व्यवस्था को पुनः संतुलित करते हैं। यह अध्याय भक्तों को धैर्य, आज्ञाकारिता और धर्म के महत्व का गहन बोध कराता है।
शिव पुराण कथा के इस अध्याय का श्रवण करने से भक्तों को जीवन में विवेक, संयम और ईश्वर की लीला को समझने की प्रेरणा मिलती है।
तारकासुर का जन्म व उसका तप - शिव पुराण - श्रीरुद्र संहिता -अध्याय 15
2026/01/18
शिव पुराण का पंद्रहवाँ अध्याय तारकासुर के जन्म, उसके भयानक तप और देवताओं पर उसके बढ़ते अत्याचार का विस्तृत वर्णन करता है।
इस अध्याय में बताया गया है कि कैसे कठोर तपस्या से तारकासुर ने अपार शक्तियाँ प्राप्त कीं, देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और सम्पूर्ण त्रिलोक भयभीत हो उठा। यह अध्याय अहंकार, शक्ति और तप के दुरुपयोग के गहरे आध्यात्मिक संदेश को उजागर करता है तथा यह दर्शाता है कि अधर्म का अंत निश्चित है। शिव पुराण का यह अध्याय भक्तों को धर्म, संयम और शिव तत्व के महत्व का बोध कराता है।
तारकासुर का जन्म व उसका तप - शिव पुराण - श्रीरुद्र संहिता - अध्याय 14
2026/01/11
शिव पुराण का पंद्रहवाँ अध्याय तारकासुर के जन्म, उसके भयानक तप और देवताओं पर उसके बढ़ते अत्याचार का विस्तृत वर्णन करता है। इस अध्याय में बताया गया है कि कैसे कठोर तपस्या से तारकासुर ने अपार शक्तियाँ प्राप्त कीं, देवताओं को पराजित कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और सम्पूर्ण त्रिलोक भयभीत हो उठा।
यह अध्याय अहंकार, शक्ति और तप के दुरुपयोग के गहरे आध्यात्मिक संदेश को उजागर करता है तथा यह दर्शाता है कि अधर्म का अंत निश्चित है। शिव पुराण का यह अध्याय भक्तों को धर्म, संयम और शिव तत्व के महत्व का बोध कराता है।
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पार्वती-शिव का दार्शनिक संवाद | शिव पुराण - श्रीरुद्र संहिता - अध्याय 13
2026/01/04
यह अध्याय शिव पुराण के उस अत्यंत भावपूर्ण प्रसंग का वर्णन करता है जहाँ देवी पार्वती भगवान शिव की कठोर तपस्या, सेवा और भक्ति द्वारा उनके हृदय को जीत लेती हैं।
देवताओं के कल्याण हेतु पार्वती-शिव का दिव्य संयोग आवश्यक था, क्योंकि तारकासुर के वध के लिए शिव के तेजस्वी पुत्र का जन्म होना था।
इस अध्याय में पार्वती की निष्ठा, कामदेव का भस्म होना, शिव की समाधि, और अंततः देवी पार्वती की तपस्या की सिद्धि का अत्यंत प्रेरणादायक वर्णन मिलता है। यह कथा भक्ति, त्याग, धैर्य और शिव-शक्ति के दिव्य रहस्य को प्रकट करती है।
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शिव पुराण - पार्वती को सेवा में रखने के लिए हिमालय का शिव को मनाना | श्रीरुद्र संहिता - अध्याय 12
2025/12/28
बारहवें अध्याय में हिमालय द्वारा भगवान शिव को पार्वती की सेवा के लिए मनाने की पवित्र कथा सुनाई गई है।
इस प्रसंग में हिमालय का भक्तिभाव, शिवजी की तपस्या, और पार्वती की महाशक्ति का गूढ़ स्वरूप उजागर होता है।
कथा बताती है कि क्यों शिवजी तपस्वियों के लिए स्त्री–संग को बाधक मानते हैं, और कैसे हिमालय अपने दलित हृदय से शिवजी से विनती करते हैं। यह अध्याय भक्ति, तप, विरक्ति, शिव–पार्वती संबंधों और हिमालय के उच्च आदर्शों का दिव्य समन्वय प्रस्तुत करता है।
शिव पुराण की इस अद्भुत कथा में दिव्य ज्ञान, धर्म, तपस्या और शिव–भक्ति का अद्वितीय संगम है।
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शिव पुराण - भगवान शिव की गंगावतरण तीर्थ में तपस्या | श्रीरुद्र संहिता - अध्याय 11
2025/12/22
भगवान शिव की गंगावतरण तीर्थ में तपस्या से जुड़ी इस पवित्र कथा में हिमालय पुत्री पार्वती, गिरिराज हिमालय और देवाधिदेव महादेव के दिव्य मिलन का अद्भुत वर्णन मिलता है।
जब महादेव ने पार्वती के जन्म का समाचार सुना, तब उन्होंने गंगोत्री के पावन स्थल पर एकांत में कठोर तप करने का निश्चय किया।
इस अध्याय में शिवजी की एकाग्रचित्त साधना, हिमालय द्वारा की गई भक्ति-पूजा, देवताओं की उपस्थितियाँ और गंगा के उद्गम स्थान का महात्म्य स्पष्ट रूप से प्रतिपादित है। यह कथा न केवल शिव-भक्ति की महानता दर्शाती है, बल्कि पार्वती के भविष्य में होने वाले शुभ विवाह की नींव भी रखती है।
गंगा, तपस्या, हिमालय और शिव की साधना—इन सभी का आध्यात्मिक संगम इस अध्याय को अत्यंत पावन और प्रेरणादायी बनाता है।
भगवान शिव की तपस्या
गंगावतरण कथा
हिमालय और शिव संवाद
शिव पार्वती की कथा
गंगा उद्गम स्थल
गंगोत्री की पौराणिक कथा
शिव पुराण अध्याय
देवाधिदेव महादेव
पार्वती जन्म कथा
शिव तपस्या वर्णन
गंगा का महत्व
शिव पुराण - भौम जन्म | श्रीरुद्र संहिता - अध्याय 10
2025/12/14
“शिव पुराण के दसवें अध्याय ‘भोम्-जन्म’ में वर्णित कथा भगवान शिव के तप, समाधि, सती-वियोग, दिव्य शिशु ‘भोम्’ के जन्म और पृथ्वी माता द्वारा उसके पालन-पोषण की अद्भुत लीला को प्रकट करती है।
इस अध्याय में शिव के अत्यंत पावन यश, उनके ध्यान, असंख्य वर्षों की समाधि, उनके मस्तक से गिरे पसीने से बालक भोम् का प्रकट होना और फिर उस दिव्य बालक का काशी जाकर कठोर तपस्या से भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का वर्णन है।
यह कथा शिव-भक्तों, पुराण प्रेमियों, हिंदू धर्मग्रंथों के पाठकों और अध्यात्म में रुचि रखने वालों के लिए अत्यंत प्रेरणादायक है। भोम्-जन्म अध्याय शिव की करुणा, शक्ति और अनंत लीला का अनूठा उदाहरण है।”
भोम् जन्म कथा
शिव पुराण दसवां अध्याय
भोम् का जन्म कैसे हुआ
भगवान शिव और भोम्
शिव पुराण कथा हिंदी में
सती-वियोग के बाद शिव की कथा
शिव की समाधि की कहानी
पृथ्वी माता और भोम्
शिव के पसीने से जन्मा बालक
भोम् की तपस्या और काशी
भोम् दिव्यलोक कथा
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शिव पुराण – पार्वती का स्वप्न | श्रीरुद्र संहिता - अध्याय 9
2025/12/07
“नवां अध्याय — पार्वती का स्वप्न” शिव पुराण का अत्यंत पवित्र अध्याय है, जिसमें देवी पार्वती के दिव्य जन्म, उनके भविष्य के संकेत, भगवान शिव से विवाह के पूर्व के शुभ स्वप्न और माता मैना-हिमालय की भावनाओं का दिव्य वर्णन मिलता है। इस अध्याय में बताया गया है कि देवी पार्वती को ब्रह्ममुहूर्त में एक अद्भुत स्वप्न प्राप्त होता है जिसमें एक तपस्वी ब्राह्मण (भगवान शिव का ही स्वरूप) उन्हें उनके भविष्य—‘शिवप्राणवल्लभा’ बनने का वरदान देते हैं। माता मैना और राजा हिमालय अपने-अपने स्वप्नों की व्याख्या एक-दूसरे से साझा करते हैं और पार्वती को शिव की तपस्या करने के लिए प्रेरित करते हैं। यह अध्याय शिव-पार्वती प्रेम, भक्ति, तपस्या और दिव्य भविष्यवाणी को उजागर करता है। शिव पुराण पढ़ने वालों, भक्तों, अध्यात्म प्रेमियों और पुराणकथाओं के शोधकर्ताओं के लिए यह अध्याय अत्यंत महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक है।
पार्वती का स्वप्न कथा
शिव पुराण नवां अध्याय
पार्वती का सपना शिव पुराण
माता पार्वती की तपस्या
भगवान शिव पार्वती विवाह कथा
मैना हिमालय संवाद
शिव पार्वती प्रेम कथा
शिवपुराण पार्वती अध्याय
ब्रह्ममुहूर्त स्वप्न कथा
देवी पार्वती जन्म और तपस्या
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शिव पुराण - मैना–हिमालय संवाद | श्रीरुद्र संहिता - अध्याय 8
2025/12/01
“शिव पुराण” के आठवें अध्याय में माता मैना और हिमालय के बीच हुआ दिव्य संवाद दर्शाया गया है, जिसमें माता मैना अपनी पुत्री पार्वती के भविष्य और विवाह को लेकर चिंतित होती हैं।
देवर्षि नारद की बातों को याद करते हुए वे हिमालय से पार्वती के लिए एक सुयोग्य, शुभ लक्षणों वाले वर की खोज करने का आग्रह करती हैं।
हिमालय उन्हें सांत्वना देते हुए बताते हैं कि यदि पार्वती को सच्चा सुख पाना है, तो उन्हें भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए तपस्या करनी होगी। वे समझाते हैं कि भगवान शंकर सदैव कल्याणकारी हैं, और यदि वे प्रसन्न हो जाएं तो स्वयं पार्वती का पाणिग्रहण करेंगे।
यह अध्याय भक्ति, तपस्या, मातृत्व, दिव्य भाग्य और शंकर-पार्वती के पवित्र मिलन की भूमिका को अत्यंत सुंदर रूप से प्रकट करता है।
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शिव पुराण - पार्वती का नामकरण | श्रीरुद्र संहिता - अध्याय 7
2025/11/23
शिव पुराण का यह अध्याय देवी पार्वती के जन्म, नामकरण और भगवान शिव से उनके दिव्य संबंध की कथा को विस्तारपूर्वक वर्णित करता है। इसमें बताया गया है कि कैसे देवी जगदंबिका ने हिमालय और मैना के घर जन्म लेकर पार्वती के रूप में अवतार लिया।
बाल्यकाल में पार्वती अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और गुणों से युक्त थीं, जिससे हिमालय और मैना अत्यंत प्रसन्न थे। नारद मुनि ने हिमालय को भविष्यवाणी दी कि पार्वती का विवाह स्वयं भगवान शिव से होगा। इस कथा में सती के पुनर्जन्म की दिव्य लीला का भी उल्लेख है, जिसमें पार्वती को अपने पूर्व जन्म की स्मृति प्राप्त होती है।
भगवान शिव और पार्वती का प्रेम अलौकिक, शाश्वत और ब्रह्मांड के संतुलन का प्रतीक बताया गया है। नारद मुनि के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि सच्चा प्रेम और तपस्या ही ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग है। यह अध्याय शिव-पार्वती के पुनर्मिलन की कथा के रूप में भक्ति, प्रेम और त्याग का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है।
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शिव पुराण – पार्वती जन्म | श्रीरुद्र संहिता - तृतीय खंड | अध्याय 6
2025/11/16
“शिव पुराण – छठा अध्याय: पार्वती जन्म” में वर्णन है कि किस प्रकार देवी जगदंबा ने हिमालय और मैना के घर जन्म लेकर माता पार्वती का दिव्य अवतार धारण किया।भगवती ने पहले हिमालय के हृदय में प्रवेश किया और फिर मैना के गर्भ से जन्म लिया। उनके जन्म के समय पूरा ब्रह्मांड प्रकाशमय हो गया — मंद-मंद हवा चलने लगी, पुष्पवृष्टि होने लगी और सभी देवता हिमालय के घर दर्शन हेतु आए।देवी ने अपने दिव्य स्वरूप में माता मैना को दर्शन दिए और कहा — “मैं पृथ्वी पर भगवान शिव को पुनः अपना पति बनाऊंगी और जगत का उद्धार करूंगी।”यह अध्याय माँ पार्वती के जन्म, उनके दिव्य रूप, तथा उनके भविष्य के उद्देश्य की कथा का विस्तार से वर्णन करता है — जिसमें भक्ति, मातृत्व और सृष्टि के संतुलन का अद्भुत संगम है।
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शिव पुराण कथा – मैना और हिमालय की तपस्या से देवी जगदंबा का वरदान |
2025/11/10
शिव पुराण के श्रीरुद्र संहिता के पाँचवें अध्याय में हिमालय और उनकी पत्नी मैना की अद्भुत तपस्या का वर्णन मिलता है। जब देवी सती ने अपने शरीर का त्याग किया और जगदंबा अंतर्धान हुईं, तब श्रीहरि विष्णु ने हिमालय और मैना को देवी जगदंबा की आराधना करने का उपदेश दिया।दोनों ने सताईस वर्षों तक कठोर तप किया — चैत्रमास से प्रारंभ होकर नवमी और अमावस्या को व्रत, पूजा, दान और ब्राह्मण सेवा के माध्यम से उन्होंने देवी दुर्गा को प्रसन्न किया।उनकी भक्ति और समर्पण से प्रसन्न होकर देवी जगदंबा स्वयं प्रकट हुईं और उन्हें वरदान दिया कि वे उनके घर पुत्री रूप में जन्म लेंगी — वही पुत्री आगे चलकर पार्वती बनीं, जो शिवजी की अर्धांगिनी बनीं।यह अध्याय शक्ति की कृपा, भक्ति की गहराई और तप के फल का जीवंत उदाहरण है।
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शिव पुराण – देवी जगदंबा का दिव्य स्वरूप और देवताओं की प्रार्थना | श्रीरुद्र संहिता - तृतीय खंड - अध
2025/11/03
शिव पुराण के श्रीरुद्र संहिता के इस अध्याय में बताया गया है कि जब सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान सहन न कर योगाग्नि द्वारा अपना शरीर त्याग दिया, तब समस्त देवता विष्णु जी के साथ हिमालय के पास पहुँचे। उन्होंने हिमालय से प्रार्थना की कि देवी सती पुनः उनके घर जन्म लें और भगवान शिव की अर्धांगिनी बनें। श्रीविष्णु के वचनों से हिमालय अत्यंत प्रसन्न हुए और देवी जगदंबा की आराधना की।
इस प्रसंग में देवताओं द्वारा की गई जगदंबा उमा की भव्य स्तुति का वर्णन मिलता है — जिसमें उन्हें गायत्री, सावित्री, सरस्वती, लक्ष्मी और वेदों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में संबोधित किया गया है।यह अध्याय दर्शाता है कि देवी सती का पुनर्जन्म पार्वती के रूप में हुआ और कैसे उनके तप, भक्ति और शिव के प्रति अटूट प्रेम ने सम्पूर्ण सृष्टि को पुनः संतुलन प्रदान किया। यह कथा भक्ति, त्याग और शक्ति के दिव्य संगम की प्रतीक है।
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शिव पुराण – देवताओं का हिमालय के पास जाना | श्रीरुद्र संहिता - तृतीय खंड | अध्याय 3
2025/10/26
शिव पुराण के श्रीरुद्र संहिता के इस अध्याय में बताया गया है कि जब सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान सहन न कर योगाग्नि द्वारा अपना शरीर त्याग दिया, तब समस्त देवता विष्णु जी के साथ हिमालय के पास पहुँचे। उन्होंने हिमालय से प्रार्थना की कि देवी सती पुनः उनके घर जन्म लें और भगवान शिव की अर्धांगिनी बनें।
श्रीविष्णु के वचनों से हिमालय अत्यंत प्रसन्न हुए और देवी जगदंबा की आराधना की। इस प्रसंग में देवताओं द्वारा की गई जगदंबा उमा की भव्य स्तुति का वर्णन मिलता है — जिसमें उन्हें गायत्री, सावित्री, सरस्वती, लक्ष्मी और वेदों की अधिष्ठात्री देवी के रूप में संबोधित किया गया है।
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