
Advertise on podcast: Gita Acharan
This podcast has
689 episodes
Language
EnglishPublisher
Siva PrasadExplicit
No
Date created
2020/08/31
Latest episode
2026/10/19
Average duration
4 min.
Release period
7 days
Description
Bhagavad Gita is a conversation between Lord Krishna and Warrior Arjun. The Gita is Lord's guidance to humanity to be joyful and attain moksha (salvation) which is the ultimate freedom from all the polarities of the physical world. He shows many paths which can be adopted based on one's nature and conditioning. This podcast is an attempt to interpret the Gita using the context of present times. Siva Prasad is an Indian Administrative Service (IAS) officer. This podcast is the result of understanding the Gita by observing self and lives of people for more than 25 years, being in public life.
Unlock Gita Acharan podcast Email contact info,
Listeners & Audience details
Email contact information
Direct podcast contact details

Listeners
Audience numbers & engagement insights

Audience details
Podcast Insights

Podcast episodes
Check latest episodes from Gita Acharan podcast
247. सभी कर्म दोषयुक्त हैं
2026/10/19
श्रीकृष्ण कहते हैं “प्रत्येक कर्म में कुछ न कुछ दोष अवश्य होता है, जैसे अग्नि धुएँ से आच्छादित होती है; अतः सहज कर्मों को त्यागना नहीं चाहिए” (18.48)। यहाँ ‘सहज कर्म’ का अर्थ हमारे स्वाभाविक कर्तव्यों से लिया गया है। एक अन्य दृष्टि से, इसका अर्थ ‘अस्तित्व से स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होने वाले कर्मों’ से भी लगाया जा सकता है। चाहे कोई भी अर्थ लिया जाए, श्रीकृष्ण का निष्कर्ष यह है कि प्रत्येक कर्म किसी न किसी दोष से युक्त होता है। इसका तात्पर्य यह है कि कोई भी कर्म पूर्णता का पर्याय नहीं होता।
श्रीकृष्ण ने कर्म के संदर्भ में अनेक शब्दों का प्रयोग किया है -जैसे अकर्म, विकर्म, और नियत कर्म । परंतु उन्होंने कहीं भी ‘शुद्ध कर्म’ करने की सलाह नहीं दी क्योंकि सभी कर्म किसी न किसी प्रकार के दोष से युक्त होते हैं। उदाहरण के लिए हमारा प्रतिरक्षा तंत्र (immune system) प्रतिदिन अनगिनत विषाणुओं और जीवाणुओं को नष्ट कर हमें रोगों से बचाता है। यदि ‘हिंसा’ को स्वभावतः अशुद्ध माना जाए तो जीवित रहना स्वयं ही अशुद्ध कर्म बन जाता है। इस प्रकार, हमारे अशुद्ध अस्तित्व द्वारा किया गया कोई भी कर्म अनिवार्य रूप से अशुद्ध ही होगा। यही स्थिति श्वास-प्रश्वास और भोजन ग्रहण करने जैसे कर्मों की भी है।
यह समझ एक महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करती है। प्रथम, यह हमें उस प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखने में सहायता करती है जिसमें हम अपने ही कर्म को नापसंद या उससे विरक्त हो जाते हैं -विशेषकर तब, जब हमें दूसरों के कर्म अधिक श्रेष्ठ प्रतीत होते हैं। यह दृष्टिकोण हमें स्पष्टता प्रदान करता है और हमारे ध्यान को हमारे स्वयं के कर्म पर केंद्रित करने में सहायता करता है। श्रीकृष्ण पहले ही आश्वस्त कर चुके हैं कि अपने स्वकर्म के प्रति निष्ठा सिद्धि (सम्पूर्णता या मुक्ति) की ओर ले जाती है (18.45)। इसके अलावा यह समझ हमें स्वयं में तथा दूसरों में दोष खोजने की प्रवृत्ति से मुक्त होने में सहायता करेगी (9.1)।
हमारे अतीत के कर्मों के प्रति अपराधबोध और पश्चात्ताप हमें जीवनभर संचालित करते रहते हैं। इसी प्रकार हम दूसरों के कर्मों के प्रति भी द्वेष पाले रहते हैं क्योंकि वे हमारे जीवन को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। यह श्लोक हमें इन पछतावों और अपराधबोध से मुक्त करता है तथा यह समझ कर द्वेष पर विजय पाने में सहायता करता है कि कर्म स्वयं ही दोषयुक्त होते हैं और इन दोषों के लिए किसी और को दोष देने की आवश्यकता नहीं है।
246. एक साधे सब सधै
2026/10/14
कहा जाता है कि सृष्टि मात्र एक लीला (दैवी खेल) है और इस खेल को रोचक बनाए रखने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं। जैसे फुटबॉल के खेल में यदि गोलपोस्ट बहुत छोटा या बहुत बड़ा हो जाए तो खेल का रोमांच समाप्त हो जाता है। उसी प्रकार, जन्म के बाद मृत्यु का आना, विभाजन या पृथक्करण का होना -ये सभी सृष्टि के ऐसे रोचक नियम हैं जिन्होंने जीवन के विकास में योगदान दिया और अंततः हमारे जैसे जटिल जीवन-रूपों का निर्माण हुआ। ये विभाजन व्यक्तिगत और सामाजिक, दोनों स्तरों पर विद्यमान हैं -जैसे जाति, धर्म, नस्ल, आर्थिक स्थिति आदि के आधार पर -और ये हमें जीवन के आरंभिक चरण में ही प्रभावित कर देते हैं। चुनौती यह है कि हम इन विभाजनों से ऊपर उठें और इस दिशा में श्रीमद्भगवद्गीता हमारा पथ-प्रदर्शन करती है।
ऐसी ही एक विधि है स्वकर्म के प्रति समर्पण। इसी संदर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं“अपने स्वकर्म के प्रति समर्पण से मनुष्य सिद्धि (पूर्णता यामुक्ति) को प्राप्त करता है क्योंकि यह समर्पण उसी की पूजा है, जिससे सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं और जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण सृष्टि व्याप्त है” (18.45-18.46)। यह निरन्तर सीखते रहने की प्रक्रिया है, जब तक हम इस प्रक्रिया का आनन्द लेते हैं और दूसरों की सम्पत्ति या शक्ति से विचलित नहीं होते। यदि हमारी प्रसन्नता दूसरों की सेवा करने में है तो हमें उसी मार्ग पर चलते रहना चाहिए -भले ही समाज उसे किसी भी दृष्टि से क्यों न देखे।
हमें जो कार्य मिला है उसे अपनी पूरी क्षमता के साथ करते रहना चाहिए। क्षमा जैसे दैवी गुण (16.3) को विकसित करके द्वेष को त्यागकर कर्म करना चाहिए न कि दूसरों के मोहक कर्मों में उलझकर और न ही अपने अतीत के पश्चात्ताप या भविष्य की अपेक्षाओं में बंधकर। स्वकर्म के प्रति ऐसा समर्पण वास्तव में ईश्वर की उपासना ही है। इसी कारण श्रीकृष्ण ने गीता के प्रसिद्ध श्लोक (2.47) में कहा है कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, कर्मफल में नहीं; क्योंकि प्रत्येक कर्म में हमें सिद्धि की ओर ले जाने की क्षमता निहित है।
245. कर्म ही पूजा है
2026/10/05
सामाजिक वर्गीकरण और उनसे संबंधित कर्मों को उनकी प्रकृति से उत्पन्न गुणों के आधार पर समझना भगवद्गीता के सबसे जटिल पहलुओं में से एक है। यह कठिनाई इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि हम किसी न किसी वर्ण के साथ गहराई से अपनी पहचान जोड़ लेते हैं। निम्नलिखित श्लोक यह स्पष्ट करते हैं कि वर्ण न तो श्रेणीबद्ध हैं और न ही किसी एक को श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि किसी भी व्यक्ति द्वारा किए गए कर्मों में सिद्धि (पूर्णता या मुक्ति) प्राप्त करने की समान क्षमता होती है।
श्रीकृष्ण कहते हैं “स्वकर्म के प्रति समर्पण से मनुष्य सिद्धि को प्राप्त करता है क्योंकि यह समर्पण उसी परमेश्वर की पूजा है, जिससे सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं और जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण सृष्टि व्यापी हुई है” (18.45-18.46)। श्रीकृष्ण ने पहले स्वधर्म (अपने स्वभाव या प्रकृति) की बात की थी और अब वे स्वकर्म का उल्लेख करते हैं। मूलतः, स्वकर्म स्वधर्म से ही उत्पन्न होता है।
आज के संदर्भ में, लगभग सभी संस्कृतियों और समाजों में कुछ व्यवसाय -जैसे खेल, अभिनय और गायन -अन्य व्यवसायों की तुलना में अधिक प्रशंसनीय हैं। इसी प्रकार प्राचीन काल में भी महत्व का निर्धारण अन्य मानकों से होता था। इन श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि अपने स्वभाव से उत्पन्न स्वकर्म को पूर्ण निष्ठा से करते हुए मनुष्य सिद्धि प्राप्त कर सकता है। वास्तव में महत्व इस बात का है कि चाहे हम किसी भी प्रकार का कार्य करें, उसे अपने सर्वोत्तम रूपमें करें।
दूसरे, हमारा विभाजनकारी मन श्रेणियाँ बनाने का अभ्यस्त है और ये श्लोक इस भ्रमित धारणा को दूर करते हैं कि वर्ण व्यवस्था श्रेणीबद्ध है। श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कर्मों में कोई श्रेणियाँ नहीं हैं -केवल अपने स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसार किए गए स्वकर्म का पालन करके भी मनुष्य सिद्धि (पूर्णता) प्राप्त कर सकता है।
तीसरे, श्रीकृष्ण ने पहले यह उपदेश दिया था कि ज्ञानी व्यक्ति को उन अज्ञानियों को विचलित नहीं करना चाहिए जो कर्मों से आसक्त हैं (3.26)। उपर्युक्त श्लोक इस उपदेश का समर्थन करते हैं क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अपनेगुणों से उत्पन्न कर्मों के माध्यम से सिद्धि प्राप्त कर सकता है। इसलिए जो व्यक्ति किसी एक मार्ग से सिद्धि प्राप्त कर चुका है उसे अन्य मार्गों को तुच्छ या हीन नहीं समझना चाहिए।
244. वर्गीकरण की विशेषताएँ
2026/09/30
जीवन का विकास, विभाजनों और भिन्नताओं का परिणाम है। किंतुइन विभाजनों के पीछे एक ‘एकत्व’ विद्यमान है जैसे विभिन्न मोतियों को एक सूत्र में पिरोने वाला अदृश्य धागा (7.7)। उद्देश्य यह है कि हम अपने चारों ओर दिखाई देने वाले अव्यवहारिक और तर्कहीन विभाजनों के मध्य उस ‘एकत्व’को अनुभव करने की क्षमता विकसित करें। यह क्षमता ‘एकत्व’ की जागरूकता और अपने कर्मों में संतुलन स्थापित करने के माध्यम से विकसित की जा सकती है (2.38, 6.16)।
श्रीकृष्ण ने गुणों और कर्मों के आधार पर समाज के चार वर्गों का उल्लेख किया है। वे कहते हैं “शांति, आत्म-संयम, तपस्या, पवित्रता, धैर्य, सत्यनिष्ठा, ज्ञान, विवेक और आस्था; ये सब गुण ब्राह्मण के स्वभाव से उत्पन्न स्वाभाविक गुण हैं (18.42)। पराक्रम, शक्ति, धैर्य, कौशल, युद्ध से पीछे न हटना, दानशीलता और नेतृत्व क्षमता; ये क्षत्रियों के स्वभाव से उत्पन्न स्वाभाविक कर्महैं (18.43)। कृषि, गोपालन और वाणिज्य; ये वैश्यों के स्वभाव से उत्पन्न स्वाभाविक कर्म हैं। सेवा से संबंधित कार्य शूद्रों के स्वाभाविक कर्म हैं”(18.44)।
ये वर्गीकरण न तो जन्म पर आधारित हैं, न ही इनमें कोई श्रेणीभेदहै, और न ही ये किसी की योग्यता का सूचक हैं। जैसे गुणों के संदर्भ में लक्ष्यउन्हें अतिक्रमित कर ‘गुणातीत’ होना है, वैसे ही यहाँ भी चुनौती इनसामाजिक विभाजनों से ऊपर उठकर ‘एकत्व’ की अनुभूति प्राप्त करना है -विशेषकर तब, जब हम स्वयं को इनमें से किसी एक वर्ग के साथ जोड़कर देखते हैं।
दूसरा, कभी हम ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करते हैं; कभी शक्ति या धन अर्जित करने का। कभी-कभी हम अपने परिवार, मित्रों या सहकर्मियों आदि की सेवा करते हैं। यह दर्शाता है कि हम समय-समय पर चारों वर्गों के गुणों को प्रदर्शित करते रहते हैं।
तीसरा, यद्यपि कोई एक गुण हमारे जीवन में प्रमुख हो सकता है,फिर भी हम प्रायः एक ही दिन में विभिन्न गुणों से होकर गुजरते हैं। यही बात इन सामाजिक वर्गों पर भी लागू होती है।
चौथा, पिछली शताब्दी में विश्व कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था से औद्योगिक और फिर सेवा-उन्मुख अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ गया है। जैसे-जैसे बाहरी परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, कोई भी एक वर्गीकरण या गुण न तो प्रमुख माना जा सकता है और न ही पूर्ण।
243. गुण ही विभाजन का कारण हैं
2026/09/27
श्रीकृष्ण कहते हैं “मैंने गुणों और कर्मों के भेद के अनुसार चार वर्णों (विभाजनों) की रचना की है; परंतु मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो (4.13)। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र -ये सब अपने-अपने स्वभाव से उत्पन्न गुणों के अनुसारकर्म करते हैं” (18.41)।
पहली बात, हमारा विभाजनकारी मन हमारे चारों ओर श्रेणियाँ बना लेता है। दूसरी बात, असत्य वास्तव में एक विकृत सत्य के सिवा कुछ नहीं है। इन दोनों के मिलन से यह असत्य धारणा बनी कि सामाजिक वर्ग जन्म पर आधारित और श्रेणीबद्ध हैं। परंतु सच्चाई यह है कि मनुष्य उनके गुणों और कर्मों के कारण चार प्रकार के होते हैं। इसके अतिरिक्त, यह विभाजन किसी व्यक्ति का मूल्यांकन करने का मापदंड नहीं है। वर्णों या जातियों से संबंधित श्लोकों को समझते समय इन तथ्यों को ध्यान में रखना चाहिए क्योंकि वर्ण और जाति आज भी हमारे सामाजिक और राजनीतिक ढांचे पर प्रभाव डालते हैं।
गुणों का वर्णन करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं “सत्व, रजस् और तमस् -ये तीन गुण आत्मा को शरीर से बाँधते हैं (14.5)। सत्व ज्ञान के प्रति आसक्ति के माध्यम से बाँधता है (14.6)। रजस् जीवात्मा को कर्म के प्रति आसक्ति से बाँधता है (14.7)। तमस् प्रमाद और आलस्य के द्वारा बांधता है” (14.8)। प्रत्येक गुण हमें किसी न किसी तरह से बाँधता ही है।
किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व पर एक गुण जीवनभर हावी रह सकता है जोउसके स्वभाव और व्यवहार को आकार देता है। फिर भी सूक्ष्म स्तर पर प्रत्येक दिन इन गुणों का एक गतिशील परस्पर खेल होता है। उदाहरण के लिए जबकार्यालय में हमें ऐसा कार्य सौंपा जाता है जिसमें अतिरिक्त ज्ञान की आवश्यकता होती है तो सत्त्वगुण हमें वह ज्ञान प्राप्त करने में सहायता करता है। रजोगुण वह इच्छा है जो हमें कार्य को समय-सीमा के भीतर पूरा करने के लिए प्रेरित करती है। दिन के अंत में जब हम थक जाते हैं तो तमोगुण हमें विश्राम और नींद प्रदान करता है। इसी प्रकार यदि हम किसी नए स्थान की ओर वाहन चला रहे हैं तो दिशा का ज्ञान सात्त्विक गुण है और वाहन चलाना राजसिक गुण है।
बन्धन गुणों के स्वभाव में निहित है और उन पर निर्भरता ही बन्धन का निर्माण करती है। स्वर्ण जंजीरें भी बन्धन को लोहे की जंजीरों से बेहतर नहीं बनाते। गुणातीत होना इस बन्धन से परे जाना है -उस परम स्वतंत्रता को प्राप्त करना जहाँ गुण साधन बन जाते हैं, स्वामी नहीं।
242. सभी गुणों से प्रभावित हैं
2026/09/08
श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में प्रकृति के तीन गुणों -सत्त्व, रजस् और तमस्, का विभिन्न प्रसंगों में विस्तार से वर्णन किया है। वे कहते हैं कि पृथ्वी पर या इस भौतिक जगत् के उच्चतर लोकों में कोई भी जीव ऐसा नहीं है जो इन तीन गुणों के प्रभाव से मुक्त हो (18.40)। इसका अर्थ यह है कि किसी भी समय हम किसी न किसी गुण के प्रभाव में रहते हैं।
श्रीकृष्ण कहते हैं सभी परिस्थितियों में कर्म गुणों द्वारा ही संपन्न होते हैं; परंतु जो व्यक्ति अहंकार से मोहित होता है, वह सोचता है -‘मैं कर्ता हूँ’ (3.27-3.29)। जो ज्ञानी इस सत्य को समझते हैं, वे आसक्त नहीं होते। गुणों में हमेंसम्मोहित कर देने की सूक्ष्म शक्ति होती है और उनके प्रभाव में हम गुणों के कार्यों से ही आसक्त हो जाते हैं। सत्रहवें और अठारहवें अध्यायों मेंगुणों के अनेक कार्यों -जैसे उपासना, आहार, यज्ञ, तप (शरीर, वाणी और मन का), दान, ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति (दृढ़ता) और सुख -का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।
श्रीकृष्ण आगे का मार्ग बताते हुए हमें प्रेरित करते हैं कि हम इन तीनों गुणों से ऊपर उठकर गुणातीत बनें -जो सुख और दुःख में समान रहते हैं, आत्मस्थित होते हैं, सुखद और दुःखद परिस्थितियों में एकरस बने रहते हैं, निंदा और स्तुति दोनों को समभाव से स्वीकार करते हैं, सम्मान और अपमान में समान रहते हैं, मित्र और शत्रु दोनों के प्रति समान दृष्टि रखते हैं, और ‘मैं कर्ता हूँ’ -इस मोह का पूर्ण परित्याग कर देते हैं (14.24-14.25)।
जबकि कर्ता का स्वभाव उस समय प्रभावी गुण (सत्त्व, रजस् और तमस्) पर निर्भर करता है, श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि गुणातीत वह है जो कर्तापन के मोह को ही त्याग देता है। इसी तरह सुख का भी स्वरूप गुणों के अनुसार बदलता रहता है परंतु गुणातीत व्यक्ति के लिए न किसी विशेष सुख की लालसा होती है और न ही किसी दुःख से विरोध। संक्षेप में, यहसमझना है कि जीवन गुणों के पारस्परिक प्रभाव का एक खेल है।
241. सुख की रूपरेखा
2026/09/07
हमारे जीवन में सुख और दुःख की द्वैत स्थितियाँ निरन्तर अनुभव होती रहती हैं। श्रीकृष्ण ने कहा है कि जब इन्द्रियाँ अपने विषयों से मिलती हैंतब सुख-दुःख की द्वंद्व अवस्थाएँ उत्पन्न होती हैं (2.14)। प्रशंसा हमें सुख देती है जबकि निन्दा दुःख पहुँचाती है; यद्यपि दोनों ही केवल शब्दों के कानों सेटकराने की घटनाएँ मात्र हैं। इस प्रकार, जीवन इन्द्रियों और इन्द्रिय-विषयों के सतत संपर्क का परिणाम है जिससे स्पष्ट होता है कि सुख-दुःख का द्वंद्व मानवीय अस्तित्व की अपरिहार्य स्थिति है।
श्रीकृष्ण सुख को तीन प्रकारों में विभाजित करते हैं जो तीनों गुणों सेउत्पन्न होते हैं (18.36)। वे कहते हैं “जो आरंभ में विष के समान और अन्त में अमृत के समान होता है, उसे सात्त्विक सुख कहा गया है। यह उस बुद्धि की निर्मलता से उत्पन्न होता है जो आत्मज्ञान से प्रकाशित होती है” (18.37)। इस प्रकार, सात्त्विक सुख वही है जैसे मन के लिए ध्यान और शरीर के लिए व्यायाम। प्रारम्भ में इन्हें करना कठिन लगता है और नियमितता बनाए रखना भी चुनौतीपूर्ण होता है परंतु समय के साथ ये मन की शांति और शारीरिक स्वास्थ्य के रूप में गहन और स्थायी आनन्द प्रदान करते हैं।
श्रीकृष्ण कहते हैं “जो सुख इन्द्रियों के उनके विषयों के संयोग से उत्पन्न होता है, जो आरंभ में अमृत के समान और अन्त में विष के समान होता है, वह राजसिक कहा गया है” (18.38)। स्वादिष्ट भोजन जैसे मिठाइयाँ खाना या धूम्रपान करना उस क्षण में आनन्द देता है परंतु समय के साथ शरीर को अपूरणीय हानि पहुँचाता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं “वह सुख जो प्रारम्भ से अंत तक आत्मा को मोहितकरने वाला है, और जो निद्रा, आलस्य तथा प्रमाद से उत्पन्न होता है, उसे तामसिक कहा गया है” (18.39)। यह वह सुख है जो अज्ञान से उत्पन्न होता हैजैसे नींद या आलस्य से मिलने वाला सुख।
कुछ लोगों के लिए सुख व्यक्तिगत उपलब्धियों में निहित होता है जबकि दूसरों के लिए वह संन्यासी या परोपकारी जीवन में मिलता है। वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो आनुवंशिकता (genetics) हमारे सुख या दुःख की प्रवृत्तियों को प्रभावित करती है। इसके मूल चाहे जो भी हों, श्रीकृष्ण के अनुसार सुख अंततः तीन प्रकार का होता है, जो किसी भी समय हम पर प्रभाव डालने वाले प्रमुख गुण द्वारा निर्धारित होता है।
240. बुद्धि और धृति
2026/08/21
कर्म और कर्ता के त्रिविध स्वरूप का वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण बताते हैं कि बुद्धि और धृति (धैर्य या साहस) भी गुणों के अनुसार त्रिविध हैं (18.29)। वे कहते हैं “जो बुद्धि यह जानती है कि सकाम कर्म और त्याग क्या है, क्या कर्तव्य है और क्या नहीं, क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, क्या भय है और क्या अभय, क्या बन्धन है और क्या मोक्ष -वह सात्त्विक कही जाती है (18.30)। जो बुद्धि धर्म और अधर्म में, कर्तव्य और अकर्तव्य में भ्रमित रहती है और उनमें भेद नहीं कर पाती -वह राजसिक कही जाती है (18.31)। जो बुद्धि अंधकार से आच्छादित होकर अधर्म को ही धर्म समझती है और सभी वस्तुओं को विपरीत रूप में देखती है -वह तामसिक कही जाती है” (18.32)।
सामान्यतः हम यह मानते हैं कि बुद्धि व्यक्ति-विशेष के अनुसार भिन्न होती है या एक ही व्यक्ति में भी समय-समय पर बदलती रहती है। परंतु इन श्लोकों से यह स्पष्ट होता है कि हमारी बुद्धि उस समय के प्रबल गुण के प्रभाव में कार्य करती है। सत्त्व की पहचान है -स्पष्टता और विवेक; तमस् की पहचान है -भ्रम और अज्ञान; जबकि रजस् इन दोनों के बीच डगमगाता रहता है।
धृति को धैर्य या दृढ़ संकल्प कहा जाता है। यह व्यक्ति के भीतर की एक सूक्ष्म शक्ति है जो उसे निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर प्रयत्नशील बनाए रखती है। कहा गया है कि धृति ही हमें वह बनाती है जो हम हैं क्योंकि यह हमारे मार्ग पर बने रहने की दृढ़ता और निरन्तरता का प्रतीक है।
धृति के विषय में श्रीकृष्ण कहते हैं “वह धृति सात्विक कहलाती है, जिससे मन, इन्द्रियों और प्राण (जीवन श्वास) को योग के द्वारा संयमित किया जाता है (18.33)। जो धृति आसक्ति और फल की इच्छा से उत्पन्न सुखों और संपत्ति से चिपकी रहती है, वह राजसिक कही गई है (18.34)। और वह धृति तामसिक कहलाती है जिसमें मनुष्य स्वप्न देखना, भय, शोक, विषाद और दम्भ (अहंकार) को नहीं छोड़ता” (18.35)।
239. कर्ता और कर्म के तीन प्रकार
2026/08/20
कर्ता और कर्म को समझना जीवन के सबसे जटिल विषयों में से एक है। भगवद्गीता में इन जटिलताओं की व्याख्या कई स्थानों पर की गई है। श्रीकृष्ण चेतावनी देते हैं कि कर्म और अकर्म (निष्क्रियता) की सूक्ष्मताओं से ज्ञानीजन भी भ्रमित हो जाते हैं (4.16)। श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि सृजन में सक्षम ब्रह्मांडीय ऊर्जा का पृथक्करण (बलिदान) (भूत-भाव-उद्भव-करो विसर्गः) कर्म कहलाता है (8.3) जो स्वयं में एक और गूढ़ विषय है। नियत कर्म भी भ्रम काएक कारण है। इसका समाधान बताते हुए श्रीकृष्ण कर्म करते हुए आन्तरिक समत्व बनाए रखने का मार्ग प्रस्तुत करते हैं। वे हमें ज्ञान की तलवार से संशयों का छेदन करने (4.41) तथा अनासक्ति की कुल्हाड़ी से गहरी जड़ें जमा चुके आसक्तियों को काटने (15.3) का उपदेश देते हैं।
गुणों के आधार पर कर्म, कर्ता और ज्ञान -इन तीनों के तीन-तीन प्रकार बताने के बाद, श्रीकृष्ण कर्म के विषय में विस्तार से कहते हैं कि “राग और द्वेष से रहित तथा फल की इच्छा के बिना किया गया नियत कर्म सात्विक कर्म कहलाता है (18.23)। जो कर्म इच्छाओं की पूर्ति की लालसा से प्रेरित होकर अथवा अहंकार के साथ और अत्यधिक परिश्रम से किया जाता है, उसे राजसिक कर्म कहा गया है (18.24)। जो कर्म मोहवश प्रारम्भ किया गया हो, जिसमें अपनी सामर्थ्य पर विचार न किया गया हो, और जिसके परिणाम, हानि या दूसरों को होने वाले कष्ट की कोई परवाह न की गई हो, वह तामसिक कर्म कहलाता है” (18.25)।
श्रीकृष्ण कर्ता को भी तीन प्रकारों में विभाजित करते हुए कहते हैं “जोकर्ता आसक्ति और अहंकार से रहित हो, उत्साह और दृढ़ निश्चय सेयुक्त हो, तथा सिद्धि-असिद्धि (सफलता-असफलता) में समभाव रखता हो, वह सात्त्विक कर्ता कहलाता है (18.26)। जो कर्ता कर्मफल की लालसा से प्रेरित होकर लोभी, हिंसक, अशुद्ध, तथा सुख-दुःख से प्रभावित रहता है, वह राजसिक कर्ता कहलाता है (18.27)। जो कर्ता अनुशासनहीन, अशिष्ट, हठी, कपटी, आलसी, उदास तथा कार्यों को टालने वाला है, वह तामसिक कर्ता कहलाता है” (18.28)।
किसी भी समय जिस गुण का प्रभाव प्रमुख होता है, उसी के अनुसार कर्म और कर्ता -दोनों का स्वभाव भी बदल जाता है।
238. विचार से कर्म तक
2026/08/16
जब हम (ज्ञाता) किसी फूल (ज्ञान के विषय) को देखते हैं तो हम उसके रंग और सुगंध (ज्ञान) सहित अनेक गुणों को ग्रहण करते हैं। यह स्थिति एक कर्म को प्रेरित करती है। उदाहरण के लिए कोई कवि उस फूल की सुंदरता का वर्णन करते हुए कविता लिख सकता है। कवि कर्ता है, कलम उसका साधन(उपकरण) है, और कविता लिखना उसका कर्म है। इसी प्रकार कोई भक्त उसफूल को अपने इष्ट देवता को अर्पित करने के लिए तोड़ सकता है;कोई प्रेमी उसी फूल को अपने प्रियजन को देने के लिए तोड़ सकताहै; और कोई वनस्पतिशास्त्री (Botanist) उस फूल की प्रकृति का अध्ययन करने में जुट जाता है।
इस संबंध में श्रीकृष्ण कहते हैं “ज्ञान, ज्ञेय (ज्ञान का विषय) और ज्ञाता -ये तीन तत्व कर्म को प्रेरित करते हैं। कर्म के उपकरण, स्वयं कर्म और कर्ता-ये तीन कर्म के घटक हैं” (18.18)। अर्थात् प्रत्येक कर्म की उत्पत्ति पहले मानसिक स्तर पर होती है और उसके पश्चात् वह भौतिक स्तर पर प्रकट होता है।
गीता के प्रारम्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं मनुष्य को केवल अपने कर्म करने का अधिकार है परंतु उनके फल (कर्मफल) पर उसका अधिकार नहीं है। आगे चलकर वे समझाते हैं कि दैवम् (दैवी इच्छा या अस्तित्व की इच्छा) भी किसी कर्म के फल के लिए उत्तरदायी कारकों में से एक है। यह तथ्य इस बात को दर्शाता है कि परिणामों को प्रभावित करने वाली एक ऐसी शक्ति भी है जो हमारे नियंत्रण से परे है। इसी संदर्भ में श्रीकृष्ण एक अन्य श्लोक में बताते हैं कि कर्म को प्रेरित करने वाले तीन प्रमुख तत्व हैं। जैसा कि पहले पुष्प के उदाहरण से स्पष्ट किया गया, ज्ञाता द्वारा किसी वस्तु के संबंध में प्राप्त ज्ञान अत्यन्त व्यक्तिनिष्ठ होता है। यही व्यक्तिनिष्ठता बताती है कि एक ही परिस्थिति में विभिन्न व्यक्ति अलग-अलग प्रकार की प्रेरणा प्राप्त करते हैं और भिन्न-भिन्न कर्म करते हैं।
श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “तीन गुणों के भेद के अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ता तीन-तीन प्रकार के बताए गए हैं (18.19)। जिस ज्ञान से मनुष्य समस्तप्राणियों में एक अविनाशी परमात्मा को अविभक्त रूप में देखता है उस ज्ञान को सात्विक माना जाता है (18.20)। जिस ज्ञान से मनुष्य अनेक प्रकार के भिन्न-भिन्न जीवों को स्वतंत्र और असंबद्ध रूप में देखता है, वह ज्ञान राजसिक कहा गया है (18.21)। और जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त है जो बिना कारण के, बिना तत्त्व के और असत्य पर आधारित है,उसे तामसिक कहा गया है” (18.22)।
237. कर्म के मूल कारण
2026/08/16
श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि कर्मों का पूर्णतः त्याग करना असम्भव है बल्कि त्यागी अपने कर्मों के फलों का त्याग करता है (18.11)। वे कर्म का विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए कहते हैं “अधिष्ठान (कर्म का स्थान), कर्ता (कर्म करने वाला), विविध साधन (उपकरण), विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ तथा दैवम् (ईश्वरीय तत्व), ये सभी कर्मों की सिद्धि के पाँच कारण हैं। मनुष्य शरीर, मन या वाणी से जो भी कर्म करता है, चाहे वह उचित हो या अनुचित, इनपाँच कारणों से ही वह संपन्न होता है। परंतु जो अल्पबुद्धि है और जिसकी समझ सीमित है, वह स्वयं को ही ‘कर्ता’ मानता है; वह अपनी अशुद्ध बुद्धि के कारण सत्य को नहीं देख पाता” (18.13 से 18.16)।
यहाँ अधिष्ठान का अर्थ हमारे मानव शरीर से है क्योंकि शरीर के बिना कोई कर्म किया ही नहीं जा सकता। जहाँ तक कर्ता का प्रश्न है, कई अवसरों पर यह स्पष्ट किया गया है कि वास्तव में तीन गुण ही सभी कर्मों के वास्तविक कर्ता हैं। साधन का स्वरूप और प्रकार समय के साथ बदलते रहते हैं जैसे कि कार, विमान आदि का आविष्कार। अस्तित्व इन साधनों का उपयोग करते हुए विविध प्रकार की गतिविधियों को प्रकट करता है।
दैवम् या दैवी शक्ति का प्रभाव कर्म का पाँचवाँ कारण है। यह निस्संदेह एक रहस्यमय कारण है जो हमारी इन्द्रियों की समझ से परे है। दैवम् ही वह कारण है जिसके चलते समान परिस्थितियों में किए गए कर्म भी भिन्न-भिन्न परिणाम देते हैं जिससे हमारे भीतर भ्रम उत्पन्न होता है।
श्रीकृष्ण कहते हैं “जो कर्तापन के अहंकार (अहं कृतः) से मुक्त है और जिसकी बुद्धि निर्मल है, वह इन लोगों को मारकर भी वास्तव में किसी को नहीं मारता” (18.17)। इससे पहले भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन को द्वन्द्वों के बीच समान भाव रखते हुए युद्ध करने के लिए कहा था (2.38)। यद्यपि ये श्लोक प्रारम्भिक साधक को कुछ असहज प्रतीत हो सकते हैं किंतु इनका चिंतन हमें गहन आत्मबोध की दिशा में ले जाता है।
यह एक अस्तित्वगत सत्य है कि हर जन्म का अंत मृत्यु होती है। जहाँ जन्म का स्वागत किया जाता है वहीं मृत्यु को तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाता है, विशेषकर जब मृत्यु का स्वरूप या कारण पीड़ादायक हो। इन श्लोकों का संदेश हमें जीवन और मृत्यु के द्वैत से परे जाने के लिए प्रेरित करता है। इन्हें हम उस आधारभूत शिक्षा के रूप में भी देख सकते हैं जो हमें कर्ता से साक्षी की अवस्था की ओर रूपांतरित होने में सहायता करती है।
236. त्यागी
2026/07/24
श्रीकृष्ण त्यागी को परिभाषित करते हुए कहते हैं “जो लोग न तो अकुशल(अप्रिय या दुःख रूप) कर्म से बचते हैं और न ही कुशल (सुखद या कल्याणकारी) कर्म में आसक्त होते हैं, वे त्यागी हैं। सात्विक गुणों से संपन्न और मेधावी होने के कारण वे संशय रहित होते है” (18.10)।
हम सभी कुशल कर्मों को करने के लिए प्रेरित होते हैं और अकुशल कर्मों से बचते हैं। हम ऐसे कर्म करते हैं जो स्वयं की, परिवार, संगठन या समाज की भलाई के लिए होते हैं। हालाँकि यह तर्कसंगत लगता है लेकिन यह कर्मों के अकुशल और कुशल के रूप में विभाजन का परिणाम है। त्यागी वह है जिसके लिए यह आंतरिक विभाजन खत्म हो जाता है। श्रीकृष्ण उन्हें मेधावी कहते हैं जो आंतरिक विभाजन को छोड़ देते हैं। जब विभाजन के अंत से एकता आती है तो उनके संदेह भी समाप्त हो जाते हैं। परिणामस्वरूप, त्यागी न तो किसी कर्म से घृणा करता है और न ही उससे आसक्त होता है।
श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “देहधारी जीवों के लिए पूर्ण रूप से कर्मों का परित्याग करना असम्भव है लेकिन जो कर्मफलों का परित्याग करते हैं, वे वास्तव में त्यागी कहलाते हैं (18.11)। कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा, बुरा और मिश्रित, ऐसे तीन प्रकार के फल मरने के पश्चात् अवश्य होते हैं; किंतु कर्मफल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल न तो इस लोक में और न परलोक में भोगना पड़ता है” (18.12)।
अस्तित्व का मूल सत्य यह है कि देहधारी प्राणी कर्मों का त्याग नहीं कर सकते क्योंकि हमारा अस्तित्व ही भोजन करने और श्वास लेने जैसी कई गतिविधियों पर निर्भर करता है। श्रीकृष्ण कर्मफल के त्याग का मार्ग बताते हैं और इस उपदेश को उन्होंने अनेक अवसरों पर दोहराया भी है।
यदि कोई कर्मफल से अपने आप को नहीं अलग करता तो क्या होता है? श्रीकृष्ण कहते हैं फल की आकांक्षा रखने वालों को तीन प्रकार के कर्मफलप्राप्त होते हैं; किंतु त्यागी को नहीं। हमारा आसक्ति भाव ही किसी कर्मफल को सुखद या दुःखद बनाता है। त्यागी वह है जो इस आसक्ति को छोड़ देता है और द्वैतों से ऊपर उठकर द्वन्द्वातीत (जो द्वन्द्वों से परे हो गया है) बन जाता है।
235. नियत कर्म
2026/07/24
भगवद्गीता में कुछ सूत्र ऐसे हैं जो समझने में तो सरल हैं, पर उन्हें जीवन में उतारना अत्यन्त कठिन है। दूसरी ओर, कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें समझ पाना ही चुनौतीपूर्ण है। ऐसा ही एक विषय है -‘नियत कर्म’ (निर्धारित या अनिवार्य कार्य)। यह प्रश्न सदा से मनुष्य को उलझन में डालता रहा है कि हमारे नियत या अनिवार्य कर्तव्य क्या हैं, किन बातों को सहना चाहिए और किन्हें नहीं। विभिन्न ज्ञानी महापुरुषों के ग्रंथों और उपदेशों में इस विषय पर भिन्न-भिन्न व्याख्याएँ मिलती हैं जो बाहर से देखने पर परस्पर विरोधाभासी प्रतीत होती हैं। स्वयं हमारी समझ भी उम्र और अनुभव के साथ बदलती रहती है।
भूख लगने पर भोजन करना और प्यास लगने पर पानी पीना, ये प्राकृतिक नियत कर्म हैं। किंतु जीवन इतना सरल नहीं है; यह अनेक जटिल परिस्थितियाँ हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है। इसलिए श्रीकृष्ण ने पहले ही कहाथा कि यह विषय अत्यन्त सूक्ष्म और जटिल है और यहाँ तक कि ज्ञानीजन भी कर्म और अकर्म (अक्रियता या निष्क्रियता) की सूक्ष्मताओं से भ्रमित हो जाते हैं (4.16)। वे आगे कहते हैं कि कर्म का स्वरूप समझना अत्यन्त कठिन है। अतः नियत या उचित कर्म को भली-भांति समझने के लिए विकर्म (निषिद्ध कर्म) और अकर्म, इन दोनों के स्वरूप को भी जानना आवश्यक है (4.17)।
त्याग (संन्यास) और नियत कर्म के संदर्भ में श्रीकृष्ण कहते हैं “नियत कर्म का कभी भी त्याग नहीं करना चाहिए। मोहवश किया गया ऐसा त्याग तामसिककहा गया है” (18.7)। जो व्यक्ति शारीरिक कष्ट के भय से दुःखदायक कर्म का परित्याग करता है, वह राजसिक त्याग करता है; ऐसा त्याग न तो लाभदायक होता है और न ही आध्यात्मिक रूप से उन्नति देने वाला” (18.8)। जो व्यक्ति आसक्ति और फल की इच्छा का त्याग करके नियत कर्म करता है, उसका त्याग सात्विक त्याग कहा जाता है” (18.9)।
इस संदर्भ में श्रीकृष्ण ने पहले कहा कि कुछ योगी देवताओं के लिए यज्ञकरते हैं; अन्य लोग ब्रह्म (परमात्मा) की अग्नि में आहुति देकर बलिदान को ही बलिदान करते हैं। मूलतः यह मन से त्याग के भाव का भी त्याग करना है। यह गुणातीत अवस्था है जो गुणों से परे हो गया है।
234. आसक्ति का त्याग
2026/07/24
त्याग के विषय में चार प्रकार के मतों या विचारधाराओं का विस्तार से वर्णन करने के बाद श्रीकृष्ण कहते हैं “अब त्याग के विषय में मेरा निश्चय सुनो। त्याग तीन प्रकार के होते हैं” (18.4)। आगे के श्लोकों में वे स्पष्ट करते हैं कि त्याग भी तीन प्रकार का होता है -सात्त्विक, राजसिक और तामसिक।
श्रीकृष्ण आगे कहते हैं “यज्ञ, दान, तथा तपस्या पर आधारित कर्मों का कभी परित्याग नहीं करना चाहिए। इन्हें निश्चित रूप से सम्पन्न करना चाहिए। यज्ञ,दान तथा तपस्या वास्तव में महात्माओं (विद्वानों) को भी शुद्ध करते हैं (18.5)। ये सब कार्य आसक्ति और फल की कामना से रहित होकर संपन्न करने चाहिए। यह मेरा स्पष्ट और अंतिम निर्णय है” (18.6)।
अज्ञानता के स्तर पर मनुष्य भौतिक वस्तुएँ, शक्ति, प्रसिद्धि और प्रभाव एकत्रित करता रहता है। त्याग उसका अगला चरण है। कोई इसे लेन-देन के रूप में देख सकता है -जैसे प्रसिद्धि पाने या पुण्य अर्जित करने के लिए दान देना आदि। कभी-कभी त्याग निराशा की अवस्था में भी होता है जैसे अर्जुन का कुरुक्षेत्र के युद्ध को त्यागने का विचार। हम सभी अपने जीवन में ऐसे द्वन्द्वों से गुजरते हैं, इसलिए भगवद्गीता में त्याग और संन्यास के विषय में विस्तार से कहा गया है।
श्रीकृष्ण ने कई अवसरों पर संन्यास के विषय में कहा है। उन्होंने बताया कि केवल संन्यास करने मात्र से सिद्धि (परिपूर्णता) प्राप्त नहीं होती (3.4); मनुष्यको सदैव नित्य संन्यासी होना चाहिए अर्थात् वह जो न तो घृणा करता है और न ही इच्छा करता है; जो द्वन्द्वों से मुक्त (द्वन्द्वातीत) है और जो सहज ही सभी बंधनों से मुक्त हो जाता है (5.3); वही संन्यासी और योगी है जो अपने नियत कर्म को बिना कर्मफल पर निर्भर हुए करता है न कि वह जो केवल कर्मों का त्याग करता है (6.1)।
ये शिक्षाएँ यहाँ पुनः प्रतिध्वनित होती हैं जब श्रीकृष्ण कहते हैं यज्ञ, दान और तप जैसे कर्मों का पालन आसक्ति रहित होकर किया जाना चाहिए। वे यहाँ भौतिक वस्तुओं से होने वाले मानसिक बंधनों की ओर संकेत कर रहे हैं। इसी प्रकार कर्मफल की अपेक्षा किए बिना कर्म करना भगवद्गीता की एक अन्य मूल शिक्षा है।
233. त्याग के चार मार्ग
2026/07/24
भगवद्गीता में अठारह अध्याय और सात सौ श्लोक हैं। अठारहवाँ अध्याय ‘मोक्ष संन्यास योग’ कहलाता है -अर्थात् संन्यास या त्याग के माध्यम से मुक्ति का योग। यह संन्यास या त्याग के मार्ग के द्वारा गंतव्य तक पहुँचना है जो कि मोक्ष या मुक्ति है। यह मुक्ति हमारी विभाजनकारी दृष्टिकोण से मुक्ति है; यह आस्थाओं या मान्यताओं से मुक्ति है; और अंततः, स्वयं त्याग से भी मुक्ति है।
यह अध्याय अर्जुन के प्रश्न से शुरू होता है “हे हृषीकेश, मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को और उनके बीच के भेद को स्पष्ट रूप से जानना चाहता हूँ” (18.1)। श्रीकृष्ण उत्तर देते हैं “कामना से अभिप्रेरित कर्मों के परित्याग को विद्वान् लोग ‘संन्यास’ कहते हैं और सभी कर्मों के फलों के त्याग को बुद्धिमान् लोग त्याग कहते है (18.2)। कुछ मनीषी घोषित करते हैं कि समस्त प्रकार के कर्मों को दोषपूर्ण मानते हुए उन्हें त्याग देना चाहिए किंतु अन्य विद्वान् यह आग्रह करते हैं कि यज्ञ, दान, तथा तपस्या जैसे कर्मों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए” (18.3)। श्रीकृष्ण ‘संन्यास’ और ‘त्याग’ शब्दों को परस्पर एक रूप में प्रयोगकरते हैं जिससे यह संकेत मिलता है कि ये दोनों त्याग या वैराग्य के लिए प्रयुक्त दो भिन्न नाम हैं।
श्रीकृष्ण हमें त्याग के विषय में प्रचलित चार विचारधाराओं से अवगत कराते हैं। संयोगवश, सभी मत और विश्वास-प्रणालियाँ मूल रूप से इन्हीं विचारधाराओं में से किसी एक पर आधारित हैं। पहले मत के अनुसार त्याग का अर्थ है सभी इच्छा से प्रेरित कर्मों का त्याग करना अर्थात् कर्म करते समय प्रेरणा या स्वार्थ की अनुपस्थिति। दूसरी विचारधारा के अनुसार त्याग का अर्थहै किसी भी कर्म को करते समय कर्म के फल का त्याग करना।
तीसरा मत यह कहता है कि सभी कर्म कलुषित (अपवित्र) हैं, अतःउनका पूर्ण परित्याग करना चाहिए। यह दृष्टिकोण ‘कर्तापन’ की भावना को त्यागने की बात करता है और ‘अस्तित्व’ या ‘परमात्मा’ को समस्त कर्मों के कर्ता के रूप में मानता है। अंततः, चौथा मत यह कहता है कि कर्मों के प्रति चयनशील होना चाहिए -यज्ञ, दान और तप जैसे कर्मों का परित्याग नहीं किया जाना चाहिए।
चाहे कोई भी मत या विचारधारा क्यों न हो, किसी न किसी रूप में ये सभी मार्ग एक ही गंतव्य -मोक्ष की ओर ले जाते हैं।
Podcast reviews
Read Gita Acharan podcast reviews
Podcast sponsorship advertising
Start advertising on Gita Acharan relevant audience podcasts
You may also like to advertise on these Podcasts

4.443501358
Something You Should Know
Mike Carruthers | OmniCast Media

4.7906254
Everything is Fine
Jennifer Romolini and Kim France

4.610861574
Serialously with Annie Elise
Annie Elise & Audioboom Studios

4.41171483
The Outlier Health Podcast
Matt Frazier, Matt Tullman, Isabelle Caputo, and Doug Hay

4.616166360
Giggly Squad
Hannah Berner & Paige DeSorbo

4.8219787
Imperfect Action
Steph Taylor

4.727561589
This Past Weekend w/ Theo Von
Theo Von

4.713027376
The Tim Dillon Show
The Tim Dillon Show

4.115993461
The Tucker Carlson Show
Tucker Carlson Network

4.828061453
Huberman Lab
Scicomm Media